शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे की जिंदगी पर बनी फिल्म का ट्रेलर बुधवार को मुंबई में लॉन्च किया हो गया. फिल्म में बाल ठाकरे का किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दीकी निभा रहे हैं. लॉन्चिंग इवेंट में फिल्म और राजनीति जगत की कई हस्तियां शामिल हुईं. ठाकरे का परिवार, शिवसेना के कार्यकर्ता भी प्रमुखता से मौजूद रहे. बाल ठाकरे की बायोपिक से राजनीतिक विवाद भी शुरू होने की आशंका है.
आइए सीधे वेन्यू से जानते हैं ट्रेलर लॉन्चिंग को लेकर इस वक्त क्या कुछ चल रहा है. फिल्म की स्क्रिप्ट शिवसेना सांसद संजय राउत ने लिखी है. वो इसे प्रोड्यूस भी कर रहे हैं. अभिजीत पानसे ने फिल्म का निर्देशन किया है. संजय लंबे वक्त से शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे के जीवन पर फिल्म बनाना चाह रहे थे. बाल ठाकरे के बेटे और शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे की अनुमति के बाद उनका सपना साकार होने जा रहा है.
ट्रेलर 2:54 मिनट का है. इसकी शुरुआत मुंबई दंगों से होती है. इसके बाद बाल ठाकरे के किरदार में नवाजुद्दीन सिद्दीकी दिखाई पड़ते हैं. बाद में बाल ठाकरे के जीवन के शुरुआती जीवन को दिखाया जाता है. बाल ठाकरे ने कैसे मराठी मानुष का आंदोलन खड़ा किया, कैसे राजनीति में प्रवेश किया कैसे शिवसेना की स्थापना हुई बाबरी मस्जिद को लेकर बाल ठाकरे क्या सोचते थे, उनके जीवन की तमाम यात्राओं को ट्रेलर में दिखाने की कोशिश की गई है.
ट्रेलर लॉन्च इवेंट में ठाकरे का परिवार प्रमुखता से मौजूद रहेगा. जानकारी के मुताबिक उद्धव ठाकरे, आदित्य ठाकरे, संजय राउत के अलावा फिल्म की स्टार कास्ट प्रमुखता से मौजूद शामिल होगी.
- महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना चीफ राज ठाकरे लॉन्चिंग इवेंट में नहीं आएंगे. इस बारे में आज तक को सूत्रों ने कन्फर्म किया है.
वीडियो नहीं सेंसर को इस चीज पर है आपत्ति
- उधर, कुछ सीन्स पर विवाद को लेकर आज तक से एक बातचीत में सेंसर बोर्ड के आधिकारिक सूत्रों ने कहा, "हमने ठाकरे फिल्म के मराठी ट्रेलर में बदलाव करने को कहा है. हमें इस ट्रेलर के दो ऑडियो पर ऑब्जेक्शन थे और हमने उसी के संदर्भ में बदलाव के लिए कहा है. कोई भी वीडियो कट नहीं है. ये फैसला फिल्ममेकर और सेंसर बोर्ड की सहमति से लिया गया है. दो ऑडियो मोडिफिकेशन के अलावा कोई भी वीडियो कट नही." (इनपुट : शिवांगी ठाकुर)
-शिवसेना के कार्यकर्ताओं में दिवंगत बाल ठाकरे के जीवन पर बन रही फिल्म को लेकर काफी उत्साह है. फिल्म से बाल ठाकरे की भूमिका में नवाजुद्दीन के कुछ लुक सामने आए थे. इसकी खूब चर्चा हुई. हालांकि एक धड़े ने इसके लिए नवाजुद्दीन की आलोचना भी की थी.
कब लॉन्च होगा ट्रेलर?
शुरुआती जानकारी के मुताबिक ट्रेलर आज दोपहर डेढ़ बजे वडाला (मुंबई) स्थित कार्निवाल आईमैक्स में लॉन्च किया जाएगा. हालांकि किछ ही देर पहले नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने एक ट्वीट किया है, जिसके मुताबिक ट्रेलर आने में अभी कुछ वक्त लग सकता है.
लर रिलीज से पहले ही शुरू हुआ विवाद
ठाकरे को मुंबई का टाइगर भी कहा जाता था. फिल्म की जबरदस्त चर्चा है. कहा जा रहा है कि इसमें ठाकरे के व्यक्तित्व के तमाम पहलू पर्दे पर दिखाए जाएंगे. हालांकि ट्रेलर लांच से पहले ही ईसा पर विवाद भी शुरू हो गए हैं. दरअसल, सेंसर की तरफ से कुछ सीन्स पर आपत्ति की गई है. इसमें से एक सीन बाबरी मस्जिद से भी जुड़ा हुआ है.
Wednesday, December 26, 2018
Sunday, December 16, 2018
मोदी का रायबरेली दौरा, कांग्रेस का 'गढ़' ढहाने की तैयारी में बीजेपी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज उत्तर प्रदेश के रायबरेली शहर जा रहे हैं जहाँ वो रेल कोच फ़ैक्ट्री के उद्घाटन के अलावा कुछ परियोजनाओं का शिलान्यास भी करेंगे.
लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी की इस यात्रा के पीछे एक बड़े राजनीतिक मक़सद को भी देखा जा रहा है.
रायबरेली में रेल कोच फ़ैक्ट्री के उद्घाटन के अलावा मोदी एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे और इसके तुरंत बाद वो प्रयागराज में रैली को संबोधित करने के लिए निकल जाएंगे.
जहां तक रायबरेली का सवाल है तो ये न सिर्फ़ कांग्रेस की सबसे ताक़तवर नेता और पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र है, बल्कि रायबरेली को गांधी परिवार का पारंपरिक गढ़ भी माना जाता है.
2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को यूपी में सिर्फ़ दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी, उनमें से एक रायबरेली भी थी. अमेठी दूसरी सीट थी जहाँ से राहुल गांधी जीते थे.
इसी साल अप्रैल महीने में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने रायबरेली का दौरा किया था और उस दौरान कांग्रेस पार्टी के एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह अपने पूरे परिवार के साथ बीजेपी में शामिल हो गए थे.
दिनेश सिंह के एक भाई कांग्रेस पार्टी से ही एमएलए और एक अन्य भाई ज़िला पंचायत के अध्यक्ष हैं. दिनेश सिंह बीजेपी में शामिल नहीं हुए थे लेकिन जानकारों के मुताबिक देर-सवेर वो भी शायद बीजेपी का दामन थाम लेंगे.
बीजेपी नेताओं के लगातार दौरे
अमित शाह के बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और फिर वित्त मंत्री अरुण जेटली भी रायबरेली का दौरा कर चुके हैं. स्मृति ईरानी अमेठी संसदीय सीट का लगातार दौरा करती रहती हैं. जानकारों का कहना है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की निगाह कांग्रेस का गढ़ समझी जाने वाली इन दोनों सीटों पर लगी हुई है.
तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में जीत से उत्साहित कांग्रेस पार्टी नरेंद्र मोदी की इस यात्रा को बहुत तवज्जो नहीं दे रही है.
रायबरेली में कांग्रेस पार्टी के ज़िलाध्यक्ष वीके शुक्ल कहते हैं कि मोदी जी चार साल के बाद भी एक बार फिर उसी परियोजना का उद्घाटन करने आ रहे हैं जिसे यूपीए सरकार ने शुरू किया था.
रायबरेली की रेल कोच फ़ैक्ट्री का निर्माण यूपीए सरकार के दौरान हुआ था और यहां रेल कोच का निर्माण शुरू भी हो गया था.
प्रधानमंत्री इसी फ़ैक्ट्री में बनी कोचों को रवाना करने के लिए रायबरेली आ रहे हैं. कांग्रेस नेता वीके शुक्ल इसे 'चुनावी हथकंडा' बताते हैं, "रायबरेली की जनता जानती है कि चार साल में उन्हें चुनाव से ठीक पहले ही फ़ुर्सत मिली है, वो भी कांग्रेस की शुरू की हुई परियोजना का उद्घाटन करने के लिए. ये सब तीन राज्यों की हार से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए है, और कुछ नहीं."
प्रधानमंत्री की इस यात्रा को तीन राज्यों में बीजेपी की हार और कांग्रेस की जीत के लिहाज़ से भी काफी अहम माना जा रहा है.
हालांकि पीएम मोदी का ये कार्यक्रम पहले से ही तय था लेकिन लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं कि इसके ज़रिए नरेंद्र मोदी पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश करेंगे.
लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी की इस यात्रा के पीछे एक बड़े राजनीतिक मक़सद को भी देखा जा रहा है.
रायबरेली में रेल कोच फ़ैक्ट्री के उद्घाटन के अलावा मोदी एक जनसभा को भी संबोधित करेंगे और इसके तुरंत बाद वो प्रयागराज में रैली को संबोधित करने के लिए निकल जाएंगे.
जहां तक रायबरेली का सवाल है तो ये न सिर्फ़ कांग्रेस की सबसे ताक़तवर नेता और पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी का संसदीय क्षेत्र है, बल्कि रायबरेली को गांधी परिवार का पारंपरिक गढ़ भी माना जाता है.
2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को यूपी में सिर्फ़ दो सीटों पर जीत हासिल हुई थी, उनमें से एक रायबरेली भी थी. अमेठी दूसरी सीट थी जहाँ से राहुल गांधी जीते थे.
इसी साल अप्रैल महीने में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने रायबरेली का दौरा किया था और उस दौरान कांग्रेस पार्टी के एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह अपने पूरे परिवार के साथ बीजेपी में शामिल हो गए थे.
दिनेश सिंह के एक भाई कांग्रेस पार्टी से ही एमएलए और एक अन्य भाई ज़िला पंचायत के अध्यक्ष हैं. दिनेश सिंह बीजेपी में शामिल नहीं हुए थे लेकिन जानकारों के मुताबिक देर-सवेर वो भी शायद बीजेपी का दामन थाम लेंगे.
बीजेपी नेताओं के लगातार दौरे
अमित शाह के बाद केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और फिर वित्त मंत्री अरुण जेटली भी रायबरेली का दौरा कर चुके हैं. स्मृति ईरानी अमेठी संसदीय सीट का लगातार दौरा करती रहती हैं. जानकारों का कहना है कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी की निगाह कांग्रेस का गढ़ समझी जाने वाली इन दोनों सीटों पर लगी हुई है.
तीन राज्यों के विधानसभा चुनाव में जीत से उत्साहित कांग्रेस पार्टी नरेंद्र मोदी की इस यात्रा को बहुत तवज्जो नहीं दे रही है.
रायबरेली में कांग्रेस पार्टी के ज़िलाध्यक्ष वीके शुक्ल कहते हैं कि मोदी जी चार साल के बाद भी एक बार फिर उसी परियोजना का उद्घाटन करने आ रहे हैं जिसे यूपीए सरकार ने शुरू किया था.
रायबरेली की रेल कोच फ़ैक्ट्री का निर्माण यूपीए सरकार के दौरान हुआ था और यहां रेल कोच का निर्माण शुरू भी हो गया था.
प्रधानमंत्री इसी फ़ैक्ट्री में बनी कोचों को रवाना करने के लिए रायबरेली आ रहे हैं. कांग्रेस नेता वीके शुक्ल इसे 'चुनावी हथकंडा' बताते हैं, "रायबरेली की जनता जानती है कि चार साल में उन्हें चुनाव से ठीक पहले ही फ़ुर्सत मिली है, वो भी कांग्रेस की शुरू की हुई परियोजना का उद्घाटन करने के लिए. ये सब तीन राज्यों की हार से लोगों का ध्यान भटकाने के लिए है, और कुछ नहीं."
प्रधानमंत्री की इस यात्रा को तीन राज्यों में बीजेपी की हार और कांग्रेस की जीत के लिहाज़ से भी काफी अहम माना जा रहा है.
हालांकि पीएम मोदी का ये कार्यक्रम पहले से ही तय था लेकिन लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार सुनीता ऐरन कहती हैं कि इसके ज़रिए नरेंद्र मोदी पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश भरने की कोशिश करेंगे.
Monday, December 10, 2018
लवयात्री की असफलता के बाद बादशाह संग काम करेंगी वरीना
बॉलीवुड में इस साल फिल्म 'लवयात्री' से करियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री वरीना हुसैन रैपर बादशाह के 'शी मूव इट लाइक' वीडियो में नजर आएंगी. उनकी एलबम 'वन' का यह गीत 10 दिसंबर को रिलीज होगा.
वरीना ने कहा, "बादशाह संग शूटिंग शानदार रही. यह गाना पहले ही मुझे बहुत पसंद है. मैं इसमें तीन अलग-अलग लुक्स में नजर आऊंगी. यह मेरा पहला पॉप वीडियो है और मुझे पहले से पता था कि अगर में पॉप सॉन्ग करूंगी तो वो बादशाह के साथ करूंगी." वह बादशाह को बेहद प्रतिभाशाली मानती हैं.
वरीना ने कहा, "संगीत को लेकर उनका बेहतरीन नजरिया है. मैं उनकी म्यूजिक वीडियो का हिस्सा बनकर सम्मानित महसूस कर रही हूं. उनके और सोनी म्यूजिक टीम के साथ शूटिंग का मेरा शानदार अनुभव रहा. मुझे यकीन है कि यह संगीत सुनने वालों और प्रशंसकों को बहुत पसंद आएगा." बता दें वरीना की फिल्म लवयात्रि बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा पाई थी. वरीना ने एडवर्ल्ड से अपने करियर की शुरुआत की है.
शाहिद कपूर इन दिनों अपनी नई फिल्म "कबीर सिंह" की शूटिंग में व्यस्त हैं. यह फिल्म 21 जून 2019 में रिलीज होगी. इसके पहले शाहिद की श्रद्धा कपूर संग "बत्ती गुल मीटर चालू" फिल्म रिलीज हुई थी. हालांकि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कमाल नहीं कर सकी. इस साल शाहिद के खाते में सिर्फ एक सफल फिल्म दर्ज है. ये फिल्म थी संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी "पद्मावत". फिल्म में शाहिद, दीपिका के अपोजिट थे.
सारा का काम देखकर उनकी दादी, शर्मिला टैगोर भी काफी संतुष्ट हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मुझे सरप्राइज होता है ये देखकर कि वो इतनी छोटी उम्र में इतनी मेच्योर है. उसके इंटरव्यू सुने हैं. वो बहुत अच्छा काम कर रही है."
बताते चलें कि केदारनाथ बॉक्स ऑफिस पर संतोषजनक कारोबार कर रही है. फिल्म ने दो दिन में 17 करोड़ की कमाई कर ली है. इसी महीने 28 दिसंबर को सारा की दूसरी फिल्म, "सिंबा" रिलीज हो रही है. रोहित शेट्टी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सारा के अपोजिट रणवीर सिंह हैं. फिल्म के कुछ गाने रिलीज हुए हैं. सारा और रणवीर की जोड़ी को पसंद किया जा रहा है.
वहीं मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतगणना की वेबकास्टिंग न करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही यह निर्देश जारी किए गए हैं कि काउंटिग हॉल में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और मतगणना के दौरान वाईफाई का इस्तेमाल न हो.
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.
इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.
वरीना ने कहा, "बादशाह संग शूटिंग शानदार रही. यह गाना पहले ही मुझे बहुत पसंद है. मैं इसमें तीन अलग-अलग लुक्स में नजर आऊंगी. यह मेरा पहला पॉप वीडियो है और मुझे पहले से पता था कि अगर में पॉप सॉन्ग करूंगी तो वो बादशाह के साथ करूंगी." वह बादशाह को बेहद प्रतिभाशाली मानती हैं.
वरीना ने कहा, "संगीत को लेकर उनका बेहतरीन नजरिया है. मैं उनकी म्यूजिक वीडियो का हिस्सा बनकर सम्मानित महसूस कर रही हूं. उनके और सोनी म्यूजिक टीम के साथ शूटिंग का मेरा शानदार अनुभव रहा. मुझे यकीन है कि यह संगीत सुनने वालों और प्रशंसकों को बहुत पसंद आएगा." बता दें वरीना की फिल्म लवयात्रि बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं दिखा पाई थी. वरीना ने एडवर्ल्ड से अपने करियर की शुरुआत की है.
शाहिद कपूर इन दिनों अपनी नई फिल्म "कबीर सिंह" की शूटिंग में व्यस्त हैं. यह फिल्म 21 जून 2019 में रिलीज होगी. इसके पहले शाहिद की श्रद्धा कपूर संग "बत्ती गुल मीटर चालू" फिल्म रिलीज हुई थी. हालांकि ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ज्यादा कमाल नहीं कर सकी. इस साल शाहिद के खाते में सिर्फ एक सफल फिल्म दर्ज है. ये फिल्म थी संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बनी "पद्मावत". फिल्म में शाहिद, दीपिका के अपोजिट थे.
सारा का काम देखकर उनकी दादी, शर्मिला टैगोर भी काफी संतुष्ट हैं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा, "मुझे सरप्राइज होता है ये देखकर कि वो इतनी छोटी उम्र में इतनी मेच्योर है. उसके इंटरव्यू सुने हैं. वो बहुत अच्छा काम कर रही है."
बताते चलें कि केदारनाथ बॉक्स ऑफिस पर संतोषजनक कारोबार कर रही है. फिल्म ने दो दिन में 17 करोड़ की कमाई कर ली है. इसी महीने 28 दिसंबर को सारा की दूसरी फिल्म, "सिंबा" रिलीज हो रही है. रोहित शेट्टी के निर्देशन में बनी इस फिल्म में सारा के अपोजिट रणवीर सिंह हैं. फिल्म के कुछ गाने रिलीज हुए हैं. सारा और रणवीर की जोड़ी को पसंद किया जा रहा है.
वहीं मध्य प्रदेश के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने मतगणना की वेबकास्टिंग न करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही यह निर्देश जारी किए गए हैं कि काउंटिग हॉल में सीसीटीवी कैमरे लगाए जाएं और मतगणना के दौरान वाईफाई का इस्तेमाल न हो.
गौरतलब है कि कुछ दिनों पहले मध्य प्रदेश के एक निजी होटल में ईवीएम मशीन और सागर जिले में बिना नंबर की स्कूल बस से स्ट्रॉन्ग रूम में ईवीएम पहुंचाए जाने का वीडियो जारी करते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि बीजेपी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जनादेश को पटलने की कोशिश कर रही है. वहीं, एक अन्य मामले में शुक्रवार को ही मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में लगभग एक घंटे के लिए बिजली नहीं होने की वजह से स्ट्रॉन्ग रूम का सीसीटीवी और एलईडी डिस्प्ले इस अवधि में काम नहीं कर पाया.
इन शिकायतों पर चुनाव आयोग ने भी माना है कि मध्य प्रदेश में ऐसी दो घटनाएं हुईं थीं जिसमें ईवीएम को लेकर नियमावली का पालन नहीं किया गया. लेकिन आयोग का कहना था कि यह गलती प्रक्रिया तक ही सीमित है और मशीनों से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई. लेकिन आयोग ने एक अधिकारी को मशीने देरी से जमा कराने के आरोप में सस्पेंड कर दिया.
Tuesday, December 4, 2018
बुलंदशहर हिंसाः कौन हैं हिंसा के अभियुक्त
उत्तर प्रदेश पुलिस ने बुलंदशहर में हुई हिंसा के मामले में अब तक चार अभियुक्तों को गिरफ़्तार किया है. पुलिस ने हिंसा के मामले में कुल 27 अभियुक्तों को नामज़द किया है.
पुलिस ने 50-60 अज्ञात लोगों को भी एफ़आईआर में शामिल किया है जिनकी घटना से जुड़े वीडियो के आधार पर पहचान करने की कोशिश की जा रही है.
बजरंग दल के सदस्य योगेश राज नाम के युवक को भी इस मामले में अभियुक्त बनाया है. योगेश राज ने ही पुलिस को कथित गोहत्या की सूचना दी थी.
यूपी पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (क़ानून व्यवस्था) आनंद कुमार के मुताबिक़ अभी तक योगेश राज को गिरफ़्तार नहीं किया गया है.
बुलंदशहर में सोमवार को भीड़ के हमले में स्याना थाने के एसएचओ सुबोध कुमार की मौत हो गई थी जबकि सुमित नाम के एक युवक की भी मौत हुई है.
इस हिंसा की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है जो 48 घंटों के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी.
हिंसा भड़काने वाले युवा
आनंद कुमार के मुताबिक़ कुल दो मुक़दमे दर्ज किए गए हैं जिनमें से एक कथित गोहत्या के मामले में है जबकि दूसरा हिंसा के मामले में है.
हिंसा के मुक़दमे में कुल 27 लोगों को नामज़द किया गया है जिनमें से चार को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है.
इन अभियुक्तों में पहला नाम योगेश राज का है. उन पर दंगा भड़काने, हत्या करने और हत्या की कोशिश करने की धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया है.
योगेश राज बुलंदशहर में विश्व हिंदू परिषद के युवा संगठन बजरंग दल के सक्रिय कार्यकर्ता हैं.
हालांकि आनंद कुमार ने पत्रकारों के सवाल पर योगेश राज के संगठन का नाम बताने से परहेज़ करते हुए कहा कि हम किसी संगठन का नाम नहीं ले रहे हैं.
उन्होंने कहा, "योगेश घटना में नामित अभियुक्त हैं जिनकी भूमिका की जांच की जा रही है."
बजरंग दल के मेरठ प्रांत के संयोजक बलराज डूंगर के मुताबिक़ योगेश राज सात-आठ साल से बजरंग दल से जुड़े हैं और बुलंदशहर के ज़िला संयोजक हैं. डूंगर के मुताबिक़ वो गोरक्षा अभियान में भी सक्रिय रहे हैं.
पुलिस ने 50-60 अज्ञात लोगों को भी एफ़आईआर में शामिल किया है जिनकी घटना से जुड़े वीडियो के आधार पर पहचान करने की कोशिश की जा रही है.
बजरंग दल के सदस्य योगेश राज नाम के युवक को भी इस मामले में अभियुक्त बनाया है. योगेश राज ने ही पुलिस को कथित गोहत्या की सूचना दी थी.
यूपी पुलिस के अतिरिक्त महानिदेशक (क़ानून व्यवस्था) आनंद कुमार के मुताबिक़ अभी तक योगेश राज को गिरफ़्तार नहीं किया गया है.
बुलंदशहर में सोमवार को भीड़ के हमले में स्याना थाने के एसएचओ सुबोध कुमार की मौत हो गई थी जबकि सुमित नाम के एक युवक की भी मौत हुई है.
इस हिंसा की जांच के लिए एसआईटी गठित की गई है जो 48 घंटों के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करेगी.
हिंसा भड़काने वाले युवा
आनंद कुमार के मुताबिक़ कुल दो मुक़दमे दर्ज किए गए हैं जिनमें से एक कथित गोहत्या के मामले में है जबकि दूसरा हिंसा के मामले में है.
हिंसा के मुक़दमे में कुल 27 लोगों को नामज़द किया गया है जिनमें से चार को पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया है.
इन अभियुक्तों में पहला नाम योगेश राज का है. उन पर दंगा भड़काने, हत्या करने और हत्या की कोशिश करने की धाराओं में मुक़दमा दर्ज किया गया है.
योगेश राज बुलंदशहर में विश्व हिंदू परिषद के युवा संगठन बजरंग दल के सक्रिय कार्यकर्ता हैं.
हालांकि आनंद कुमार ने पत्रकारों के सवाल पर योगेश राज के संगठन का नाम बताने से परहेज़ करते हुए कहा कि हम किसी संगठन का नाम नहीं ले रहे हैं.
उन्होंने कहा, "योगेश घटना में नामित अभियुक्त हैं जिनकी भूमिका की जांच की जा रही है."
बजरंग दल के मेरठ प्रांत के संयोजक बलराज डूंगर के मुताबिक़ योगेश राज सात-आठ साल से बजरंग दल से जुड़े हैं और बुलंदशहर के ज़िला संयोजक हैं. डूंगर के मुताबिक़ वो गोरक्षा अभियान में भी सक्रिय रहे हैं.
Monday, November 19, 2018
क्या 'आदिवासियों के हिन्दूकरण' से जीत रही बीजेपी
समाजवादी जनपरिषद के उम्मीदवार फागराम पिछले तीन चुनावों से खड़े हो रहे हैं, लेकिन दो से पाँच हज़ार वोटों में ही सिमट कर रह जाते हैं.
फागराम इस बार होशंगाबाद ज़िले के सिवनी मालवा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं. वो जानते हैं कि इस बार भी चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन फिर भी लड़ रहे हैं. फागराम आदिवासी हैं और एक मोटरसाइकिल से अपने इलाक़े में प्रचार करने निकलते हैं.
एक तरफ़ जहां कांग्रेस और बीजेपी के करोड़पति उम्मीदवार हैं तो दूसरी तरफ़ एक झोले के साथ प्रचार पर निकलने वाले फागराम. फागराम आख़िर क्यों चुनाव लड़ते हैं?
वो कहते हैं, ''मैं इन्हें जिस हद तक चुनौती दे सकता हूं और आदिवासियों के बीच जितनी जागरुकता फैला सकता हूं उसे करने से बाज नहीं आऊंगा. भले कभी ना जीत पाऊं.''
मध्य प्रदेश में आदिवासी लगभग 23 फ़ीसदी हैं और इनके लिए 47 सीटें सुरक्षित हैं.
2013 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 47 में से 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
2008 में भी 47 में से 31 आदिवासी सीटें बीजेपी की झोली में गईं. 2003 में परिसीमन से पहले आदिवासियों के लिए 41 सीटें रिज़र्व थीं और बीजेपी ने 37 सीटें जीती थीं.
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण हो रहा था, लेकिन दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश के 1993 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें कम हो गई थीं.
1990 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कुल 320 में से पूर्ण बहुमत से भी ज़्यादा 220 सीटों पर जीत मिली थी जो 1993 में 116 पर आकर सिमट गई.
1993 में आदिवासियों के लिए रिज़र्व सीटों पर बीजेपी के महज़ तीन प्रत्याशी ही जीत पाए थे. 1993 में ही दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने और 2003 तक रहे.
आख़िर बीजेपी ने आदिवासियों के लिए ऐसा क्या कर दिया है कि लगभग सुरक्षित सीटें पिछले तीन चुनावों से उसी की झोली में जा रही हैं? ऐसा तब है जब आदिवासी आज भी वन अधिकार के लिए लड़ रहे हैं. शिक्षा और रोज़गार के मामले में पिछड़े हुए हैं और बड़े बांधों के कारण आज भी विस्थापन का दंश झेल रहे हैं.
सिवली मालवा के ही केसला गांव के इक़बाल बालू जेएनयू से पीएचडी कर रहे हैं.
फागराम भी इसी गांव के हैं. इक़बाल बीजेपी की जीत के कई कारण बताते हैं.
वो कहते हैं, ''पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस ज़मीनी स्तर पर बुरी तरह से बिखर गई है. आदिवासियों की एक पार्टी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी बनी भी तो वो जल्द ही राजनीतिक सौदेबाज़ी में लिप्त हो गई. गोंडवाना गणतंत्र के नाम से ही ऐसा लग रहा था कि यह केवल गोंड आदिवासियों के लिए है जबकि मध्य प्रदेश में भील आदिवासी भी भारी तादाद में हैं.''
इक़बाल कहते हैं, ''इस दौरान आरएसएस के संगठन वनवासी कल्याण परिषद ने भी आदिवासियों के बीच अपने एजेंडों को फैलाया. वनवासी कल्याण परिषद ने कई धार्मिक अनुष्ठानों का बड़े पैमाने पर आयोजन कराया. इसमें सबरी के किरदार को इन्होंने आगे किया. इन्होंने बताया कि कैसे सबरी ने राम को जूठा बेर खिलाया था और राम ने बेर प्रेमवश खाए थे. ये सबरी कुंभ का आयोजन करने लगे. आदिवासियों को दूसरे राज्यों में धार्मिक यात्राओं पर भेजने लगे. इन्होंने हाशिए के आदिवासी इलाक़ों में छात्रावास और पुस्तकालय खोले. पुस्तकालय में मिलने वाली किताबें हिन्दूवादी विचारों की ओर प्रेरित करने वाली होती हैं और छात्रावास में जो छात्र रहते हैं, आरएसएस उन्हें अपने हिसाब से प्रशिक्षित करता है.''
इक़बाल कहते हैं कि मसला केवल आरएसएस का ही नहीं है बल्कि मीडिया ने भी सवर्ण मूल्यों और हिन्दू रीति-रिवाज को स्थापित करने में अपनी भूमिका अदा की है. मध्य प्रदेश में आदिवासी इलाक़ों में काम करने वाले अनुराग मोदी भी इक़बाल से सहमत दिखते हैं.
आरएसएस के लोग आदिवासियों को वनवासी कहना पसंद करते हैं. 2002 में जब बिहार का विभाजन हुआ था तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार इसका नाम वनांचल रखना चाहती थी न कि झारखंड. आरएसएस का कहना है कि जो भी वन में रहते हैं सब वनवासी हैं.
फागराम इस बार होशंगाबाद ज़िले के सिवनी मालवा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं. वो जानते हैं कि इस बार भी चुनाव नहीं जीतेंगे, लेकिन फिर भी लड़ रहे हैं. फागराम आदिवासी हैं और एक मोटरसाइकिल से अपने इलाक़े में प्रचार करने निकलते हैं.
एक तरफ़ जहां कांग्रेस और बीजेपी के करोड़पति उम्मीदवार हैं तो दूसरी तरफ़ एक झोले के साथ प्रचार पर निकलने वाले फागराम. फागराम आख़िर क्यों चुनाव लड़ते हैं?
वो कहते हैं, ''मैं इन्हें जिस हद तक चुनौती दे सकता हूं और आदिवासियों के बीच जितनी जागरुकता फैला सकता हूं उसे करने से बाज नहीं आऊंगा. भले कभी ना जीत पाऊं.''
मध्य प्रदेश में आदिवासी लगभग 23 फ़ीसदी हैं और इनके लिए 47 सीटें सुरक्षित हैं.
2013 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 47 में से 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी.
2008 में भी 47 में से 31 आदिवासी सीटें बीजेपी की झोली में गईं. 2003 में परिसीमन से पहले आदिवासियों के लिए 41 सीटें रिज़र्व थीं और बीजेपी ने 37 सीटें जीती थीं.
1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण हो रहा था, लेकिन दिलचस्प है कि मध्य प्रदेश के 1993 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की सीटें कम हो गई थीं.
1990 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी को कुल 320 में से पूर्ण बहुमत से भी ज़्यादा 220 सीटों पर जीत मिली थी जो 1993 में 116 पर आकर सिमट गई.
1993 में आदिवासियों के लिए रिज़र्व सीटों पर बीजेपी के महज़ तीन प्रत्याशी ही जीत पाए थे. 1993 में ही दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने और 2003 तक रहे.
आख़िर बीजेपी ने आदिवासियों के लिए ऐसा क्या कर दिया है कि लगभग सुरक्षित सीटें पिछले तीन चुनावों से उसी की झोली में जा रही हैं? ऐसा तब है जब आदिवासी आज भी वन अधिकार के लिए लड़ रहे हैं. शिक्षा और रोज़गार के मामले में पिछड़े हुए हैं और बड़े बांधों के कारण आज भी विस्थापन का दंश झेल रहे हैं.
सिवली मालवा के ही केसला गांव के इक़बाल बालू जेएनयू से पीएचडी कर रहे हैं.
फागराम भी इसी गांव के हैं. इक़बाल बीजेपी की जीत के कई कारण बताते हैं.
वो कहते हैं, ''पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस ज़मीनी स्तर पर बुरी तरह से बिखर गई है. आदिवासियों की एक पार्टी गोंडवाना गणतंत्र पार्टी बनी भी तो वो जल्द ही राजनीतिक सौदेबाज़ी में लिप्त हो गई. गोंडवाना गणतंत्र के नाम से ही ऐसा लग रहा था कि यह केवल गोंड आदिवासियों के लिए है जबकि मध्य प्रदेश में भील आदिवासी भी भारी तादाद में हैं.''
इक़बाल कहते हैं, ''इस दौरान आरएसएस के संगठन वनवासी कल्याण परिषद ने भी आदिवासियों के बीच अपने एजेंडों को फैलाया. वनवासी कल्याण परिषद ने कई धार्मिक अनुष्ठानों का बड़े पैमाने पर आयोजन कराया. इसमें सबरी के किरदार को इन्होंने आगे किया. इन्होंने बताया कि कैसे सबरी ने राम को जूठा बेर खिलाया था और राम ने बेर प्रेमवश खाए थे. ये सबरी कुंभ का आयोजन करने लगे. आदिवासियों को दूसरे राज्यों में धार्मिक यात्राओं पर भेजने लगे. इन्होंने हाशिए के आदिवासी इलाक़ों में छात्रावास और पुस्तकालय खोले. पुस्तकालय में मिलने वाली किताबें हिन्दूवादी विचारों की ओर प्रेरित करने वाली होती हैं और छात्रावास में जो छात्र रहते हैं, आरएसएस उन्हें अपने हिसाब से प्रशिक्षित करता है.''
इक़बाल कहते हैं कि मसला केवल आरएसएस का ही नहीं है बल्कि मीडिया ने भी सवर्ण मूल्यों और हिन्दू रीति-रिवाज को स्थापित करने में अपनी भूमिका अदा की है. मध्य प्रदेश में आदिवासी इलाक़ों में काम करने वाले अनुराग मोदी भी इक़बाल से सहमत दिखते हैं.
आरएसएस के लोग आदिवासियों को वनवासी कहना पसंद करते हैं. 2002 में जब बिहार का विभाजन हुआ था तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार इसका नाम वनांचल रखना चाहती थी न कि झारखंड. आरएसएस का कहना है कि जो भी वन में रहते हैं सब वनवासी हैं.
Sunday, November 18, 2018
जंगल की आग से जुड़े पांच बड़े मिथक
अमरीका के कैलिफ़ोर्निया में जंगल की आग ने भयंकर तबाही मचाई है.
हज़ारों लोगों को घर छोड़कर भागना पड़ा और दर्जनों लोगों की मौत हो गई. इससे पहले, इसी साल की शुरुआत में यूनान में एक के बाद एक सिलसिलेवार ढंग से फैली जंगल की आग ने 99 लोगों की जान ले ली थी.
ये 2009 के बाद जंगल की आग से हुई सबसे बड़ी तबाही थी. जुलाई 2018 में रूस के जंगलों में लगी आग का धुआं प्रशांत महासागर को पार कर के अमरीका तक पहुंच गया था.
जंगल की आग का ये नया और भयानक रूप है.
अब जबकि दुनिया भर में जंगल में भड़क उठने वाली आग की घटनाएं बढ़ रही हैं तो इसे लेकर लोगों की जो ग़लतफ़हमियां हैं, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं.
आपको ये भी रोचक लगेगा
क्या 'आदिवासियों के हिन्दूकरण' से जीत रही बीजेपी?
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सिर पर तलवार के वार से मारी गई थीं रानी लक्ष्मीबाई
असली 'ठग्स ऑफ़ हिंदुस्तान' जिनसे डरते थे अंग्रेज़
जंगल की आग से जुड़ी जो पांच अवधारणाएं हैं, वो इस आग से निपटने की हमारी कोशिशों को नाकाम कर सकती हैं. इसलिए इन्हें जानना ज़रूरी है.
जंगल की आग से जुड़ी ये सबसे आम ग़लतफ़हमी है. लोगों को लगता है कि पेड़ों को काटने-छांटने से आग भड़कने का डर कम हो जाता है.
लेकिन, जंगलों के बहुत से जानकार कहते हैं कि कटाई-छंटाई से जंगल में आग कम नहीं होती, बल्कि भड़क उठती है.
इसकी वजह ये है कि पेड़ काटने के बाद उसके ठूंठ, सूखी पत्तियां और दूसरे सूखे हिस्से गिरे रह जाते हैं. ये आग को और भड़काने का काम करते हैं.
इस बात को सही ठहराने वाले कई वैज्ञानिक तथ्य हैं. जैसे कि एक हालिया रिसर्च बताती है कि जहां पर जंगलों को क़ाबू करने की ज़्यादा कोशिश हुई, वहां पर आग ज़्यादा भड़की.
जंगल की आग पर रिसर्च करने वाले विद्वान कहते हैं कि जंगल काटने से संरक्षित जीवों का कोई बचाव नहीं होता.
हकीकत ये है कि चकत्तेदार उल्लू जैसी कई विलुप्त हो रही प्रजातियां, जले हुए पेड़ों से ही फ़ायदे में रहते हैं. पेड़ काटने से उन्हें नुक़सान होता है.
आग के बाद भी जो कटाई-छंटाई होती है, वो भी इन जीवों के लिए नुक़सानदेह होती है.
इससे अच्छा विकल्प ये है कि जंगलों को पूरी तरह से ही साफ़ कर दिया जाए.
अक्सर आग से मुक़ाबला करने वाले ये विकल्प कामयाबी से आज़माते रहे हैं.
इमारत बनाते वक़्त ही जल्द आग पकड़ने वाली चीज़ों का कम से कम इस्तेमाल होना चाहिए.
ज्वलनशील चीज़ों को मकान के आस-पास नहीं रखना चाहिए. जैसे कि सूखी पत्तियों को घर के ऊपर या पास की नालियों में जमा नहीं होने देना चाहिए.
मकान के इर्द-गिर्द लोग सुरक्षा घेरा भी तैयार कर सकते हैं. मकान से एक नियमित दूरी तक झाड़ियां, सूखी लकड़ियां और पत्तियां हटा दी जानी चाहिए.
जब तेज़ी से आग पकड़ने वाली ऐसी चीज़ें घर से 30-100 फुट की दूरी पर रहती हैं, तो घर तक आग पहुंचने का डर कम होता है.
इसी तरह घर से दूर वाले कुछ पेड़ों की ऊंचाई 100 फुट तक होनी चाहिए.
पेड़ों की कटाई-छंटाई भी नियमित रूप से होनी चाहिए, ताकि आग पकड़ने का सामान आस-पास न रहे.
हज़ारों लोगों को घर छोड़कर भागना पड़ा और दर्जनों लोगों की मौत हो गई. इससे पहले, इसी साल की शुरुआत में यूनान में एक के बाद एक सिलसिलेवार ढंग से फैली जंगल की आग ने 99 लोगों की जान ले ली थी.
ये 2009 के बाद जंगल की आग से हुई सबसे बड़ी तबाही थी. जुलाई 2018 में रूस के जंगलों में लगी आग का धुआं प्रशांत महासागर को पार कर के अमरीका तक पहुंच गया था.
जंगल की आग का ये नया और भयानक रूप है.
अब जबकि दुनिया भर में जंगल में भड़क उठने वाली आग की घटनाएं बढ़ रही हैं तो इसे लेकर लोगों की जो ग़लतफ़हमियां हैं, उस पर भी सवाल उठ रहे हैं.
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जंगल की आग से जुड़ी जो पांच अवधारणाएं हैं, वो इस आग से निपटने की हमारी कोशिशों को नाकाम कर सकती हैं. इसलिए इन्हें जानना ज़रूरी है.
जंगल की आग से जुड़ी ये सबसे आम ग़लतफ़हमी है. लोगों को लगता है कि पेड़ों को काटने-छांटने से आग भड़कने का डर कम हो जाता है.
लेकिन, जंगलों के बहुत से जानकार कहते हैं कि कटाई-छंटाई से जंगल में आग कम नहीं होती, बल्कि भड़क उठती है.
इसकी वजह ये है कि पेड़ काटने के बाद उसके ठूंठ, सूखी पत्तियां और दूसरे सूखे हिस्से गिरे रह जाते हैं. ये आग को और भड़काने का काम करते हैं.
इस बात को सही ठहराने वाले कई वैज्ञानिक तथ्य हैं. जैसे कि एक हालिया रिसर्च बताती है कि जहां पर जंगलों को क़ाबू करने की ज़्यादा कोशिश हुई, वहां पर आग ज़्यादा भड़की.
जंगल की आग पर रिसर्च करने वाले विद्वान कहते हैं कि जंगल काटने से संरक्षित जीवों का कोई बचाव नहीं होता.
हकीकत ये है कि चकत्तेदार उल्लू जैसी कई विलुप्त हो रही प्रजातियां, जले हुए पेड़ों से ही फ़ायदे में रहते हैं. पेड़ काटने से उन्हें नुक़सान होता है.
आग के बाद भी जो कटाई-छंटाई होती है, वो भी इन जीवों के लिए नुक़सानदेह होती है.
इससे अच्छा विकल्प ये है कि जंगलों को पूरी तरह से ही साफ़ कर दिया जाए.
अक्सर आग से मुक़ाबला करने वाले ये विकल्प कामयाबी से आज़माते रहे हैं.
इमारत बनाते वक़्त ही जल्द आग पकड़ने वाली चीज़ों का कम से कम इस्तेमाल होना चाहिए.
ज्वलनशील चीज़ों को मकान के आस-पास नहीं रखना चाहिए. जैसे कि सूखी पत्तियों को घर के ऊपर या पास की नालियों में जमा नहीं होने देना चाहिए.
मकान के इर्द-गिर्द लोग सुरक्षा घेरा भी तैयार कर सकते हैं. मकान से एक नियमित दूरी तक झाड़ियां, सूखी लकड़ियां और पत्तियां हटा दी जानी चाहिए.
जब तेज़ी से आग पकड़ने वाली ऐसी चीज़ें घर से 30-100 फुट की दूरी पर रहती हैं, तो घर तक आग पहुंचने का डर कम होता है.
इसी तरह घर से दूर वाले कुछ पेड़ों की ऊंचाई 100 फुट तक होनी चाहिए.
पेड़ों की कटाई-छंटाई भी नियमित रूप से होनी चाहिए, ताकि आग पकड़ने का सामान आस-पास न रहे.
Friday, November 16, 2018
करण से हुई सुलह, 'कॉफी विद करन 6' में काजोल संग आएंगे अजय देवगन
करण जौहर के शो कॉफी विद करण 6 में एक बार फिर से जोड़ी का धमाल दिखने वाला है. शो के अगले एपिसोड में काजोल और अजय देवगन साथ में शिरकत करने जा रहे हैं. करण जौहर समेत दोनों कलाकारों ने भी सोशल मीडिया पर फोटो पोस्ट कर इसकी जानकारी साझा की. बता दें कि साल 2016 में अजय और करण के बीच मनमुटाव हो गया था जिसपर अब फुलस्टॉप लगता नजर आ रहा है.
काजोल ने एक बूमेरांग वीडियो शेयर किया जिसमें उनके साथ अजय देवगन स्माइल करते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो में करण जौहर सिर हिलाते नजर आ रहे हैं. इसके अलावा अजय देवगन ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर वीडियो शेयर किया है जिसमें तीनों कलाकार हंसते हुए पोज देते नजर आ रहे हैं.
शो के होस्ट करण जौहर ने भी अपने इंस्टेग्राम पेज पर एक फोटो शेयर की. उन्होंने कैप्शन में लिखा- ''एक टैलेंटेड हसबैंड-वाइफ के साथ कॉफी.'' फोटो में तीनों कलाकारों के बीच अच्छी बॉन्डिंग देखी जा सकती है. बता दें कि साल 2016 में अजय देवगन की फिल्म शिवाय और करण जौहर की फिल्म ए दिल है मुश्किल के रिलीज के वक्त डेट्स को लेकर दोनों के बीच अनबन की खबरें सामने आई थीं.
कुछ दिन पहले आई रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों कलाकारों में सुलझ हो गई है. ये सुलझ और किसी ने नहीं बल्कि काजोल ने ही कराई है. फिल्मों की बात करें तो अजय देवगन की अगली फिल्म तानाजी है. ये एक हिस्टॉरिकल कहानी है. करण की बात करें तो उनके निर्माण में फिल्म ब्रह्मास्त्र साल के अंत में रिलीज होगी. फिल्म में रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की जोड़ी साथ में काम करती हुई नजर आएगी.
करण जौहर के पॉपुलर चैट शो के इस नए सीजन में अब तक कई सारे सेलेब्स शिरकत कर चुके हैं. इसकी शुरुआत आलिया भट्ट और दीपिका पादुकोण ने की. इसके बाद रणवीर सिंह - अक्षय कुमार, कटरीना कैफ - वरुण धवन, सैफ अली खान - सारा अली खान जोड़ियों में नजर आ चुके हैं. अब बॉलीवुड की ये बेमिसाल ऑफ स्क्रीन और ऑन स्क्रीन जोड़ी साथ में नजर आएगी
रुआती जांच मे ये मामला दलालों के माध्यम से सरकारी योजनाओं के पैसे की बंदरबांट का लग रहा है. दरअसल, सीतापुर के संदीप कुमार महमूदाबाद ब्लॉक के जाफरपुर गांव में सफाई कर्मी हैं. आठ माह पूर्व जिले के परसेंडी ब्लॉक के शेरपुर सरांवा में रोहन लाल की पुत्री प्रियंका से उनकी शादी हुई थी.
जब संदीप ने ससुराल में अपनी पत्नी के बैंक खाते की डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि गत 28 सितंबर को पीएफएमएस (पब्लिक फाइनेंसियल मैनेजमेंट सिस्टम) के जरिये तीन हजार रुपये भेजे गए थे. पूछताछ पर पता चला कि यह राशि प्रोबेशन विभाग से विधवा पेंशन के तौर पर भेजी गई है.
संदीप ने जिला प्रोबेशन अधिकारी को जानकारी दी कि उनके जीवित रहते हुए ही उनकी पत्नी के खाते में विधवा पेंशन भेजी जा रही है. जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो संदीप ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डीएम से शिकायत की. साथ ही कहा कि इस मामले पर उन्हें धमकियां मिल रही हैं.
इस पूरे मामले में सीडीओ संदीप कुमार ने बताया कि इस प्रकरण से संबंधित सभी दस्तावेजों को कब्जे में ले लिया गया है. आगे की जांच मे पता चला कि सीतापुर जिले के दो दर्जन खातों में पैसे ट्रॉसफर किए गए जबकि सभी खाताधारकों के पति अभी जिंदा हैं.
काजोल ने एक बूमेरांग वीडियो शेयर किया जिसमें उनके साथ अजय देवगन स्माइल करते हुए नजर आ रहे हैं. वीडियो में करण जौहर सिर हिलाते नजर आ रहे हैं. इसके अलावा अजय देवगन ने अपने इंस्टाग्राम पेज पर वीडियो शेयर किया है जिसमें तीनों कलाकार हंसते हुए पोज देते नजर आ रहे हैं.
शो के होस्ट करण जौहर ने भी अपने इंस्टेग्राम पेज पर एक फोटो शेयर की. उन्होंने कैप्शन में लिखा- ''एक टैलेंटेड हसबैंड-वाइफ के साथ कॉफी.'' फोटो में तीनों कलाकारों के बीच अच्छी बॉन्डिंग देखी जा सकती है. बता दें कि साल 2016 में अजय देवगन की फिल्म शिवाय और करण जौहर की फिल्म ए दिल है मुश्किल के रिलीज के वक्त डेट्स को लेकर दोनों के बीच अनबन की खबरें सामने आई थीं.
कुछ दिन पहले आई रिपोर्ट्स के मुताबिक दोनों कलाकारों में सुलझ हो गई है. ये सुलझ और किसी ने नहीं बल्कि काजोल ने ही कराई है. फिल्मों की बात करें तो अजय देवगन की अगली फिल्म तानाजी है. ये एक हिस्टॉरिकल कहानी है. करण की बात करें तो उनके निर्माण में फिल्म ब्रह्मास्त्र साल के अंत में रिलीज होगी. फिल्म में रणबीर कपूर और आलिया भट्ट की जोड़ी साथ में काम करती हुई नजर आएगी.
करण जौहर के पॉपुलर चैट शो के इस नए सीजन में अब तक कई सारे सेलेब्स शिरकत कर चुके हैं. इसकी शुरुआत आलिया भट्ट और दीपिका पादुकोण ने की. इसके बाद रणवीर सिंह - अक्षय कुमार, कटरीना कैफ - वरुण धवन, सैफ अली खान - सारा अली खान जोड़ियों में नजर आ चुके हैं. अब बॉलीवुड की ये बेमिसाल ऑफ स्क्रीन और ऑन स्क्रीन जोड़ी साथ में नजर आएगी
रुआती जांच मे ये मामला दलालों के माध्यम से सरकारी योजनाओं के पैसे की बंदरबांट का लग रहा है. दरअसल, सीतापुर के संदीप कुमार महमूदाबाद ब्लॉक के जाफरपुर गांव में सफाई कर्मी हैं. आठ माह पूर्व जिले के परसेंडी ब्लॉक के शेरपुर सरांवा में रोहन लाल की पुत्री प्रियंका से उनकी शादी हुई थी.
जब संदीप ने ससुराल में अपनी पत्नी के बैंक खाते की डिटेल्स निकलवाई तो पता चला कि गत 28 सितंबर को पीएफएमएस (पब्लिक फाइनेंसियल मैनेजमेंट सिस्टम) के जरिये तीन हजार रुपये भेजे गए थे. पूछताछ पर पता चला कि यह राशि प्रोबेशन विभाग से विधवा पेंशन के तौर पर भेजी गई है.
संदीप ने जिला प्रोबेशन अधिकारी को जानकारी दी कि उनके जीवित रहते हुए ही उनकी पत्नी के खाते में विधवा पेंशन भेजी जा रही है. जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो संदीप ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डीएम से शिकायत की. साथ ही कहा कि इस मामले पर उन्हें धमकियां मिल रही हैं.
इस पूरे मामले में सीडीओ संदीप कुमार ने बताया कि इस प्रकरण से संबंधित सभी दस्तावेजों को कब्जे में ले लिया गया है. आगे की जांच मे पता चला कि सीतापुर जिले के दो दर्जन खातों में पैसे ट्रॉसफर किए गए जबकि सभी खाताधारकों के पति अभी जिंदा हैं.
Sunday, November 11, 2018
अल्बानिया के तानाशाह ने आख़िर क्यों बनवाए थे 13 हज़ार बंकर
बंकर अक्सर सरहदों पर मिलते हैं, जो दुश्मनों के हमले से किसी देश की हिफ़ाज़त और मोर्चेबंदी का काम करते हैं.
पर, दुनिया में एक देश ऐसा भी है, जहां क़दम-क़दम पर बंकर मिलते हैं. इस देश का नाम है अल्बानिया. इसी देश में मदर टेरेसा का जन्म हुआ था.
पर, कई दशकों के कम्युनिस्ट शासन के दौरान ये मुल्क बाक़ी दुनिया से पूरी तरह से अलग-थलग रहा.
इसके वामपंथी तानाशाह एनवर होक्सहा को दुश्मनों का ऐसा ख़ौफ़ हुआ कि उसने पूरे देश में बंकर बनवा डाले.
अल्बानिया के गाइड एल्टन कॉशी मज़ाक़ में कहते हैं कि आज ये बंकर टूरिज़्म के विस्तार का ज़रिया बन गए हैं.
यूं तो अल्बानिया का हज़ारों साल पुराना इतिहास है. पर आज चालीस साल पुराना इतिहास, हज़ारों साल की विरासत पर भारी पड़ रही है.
युद्ध का डर
आप अल्बानिया के एड्रियाटिक तट से देश के भीतरी हिस्से की तरफ़ बढ़ें, तो क़दम-क़दम पर बंकर बने हुए दिखेंगे. दीवारों के ऊपर गोलाकार ताज सा रखा हुआ है.
ये बंकर 1970 के दशक में बनाए गए थे. उस वक़्त अल्बानिया दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ देश था.
इन्हें बनाने की सनक तानाशाह एनवर होक्सहा को उस वक़्त चढ़ी, जब अल्बानिया के रिश्ते सोवियत संघ से ख़राब हो गए.
एनवर को लगता था कि पड़ोसी देशों युगोस्लाविया और यूनान से लेकर अमरीका और सोवियत संघ तक, हर मुल्क उनके वतन पर चढ़ाई करने वाला है.
इसी डर से एनवर होक्सहा ने पूरे देश की हिफ़ाज़त के लिए बंकर बनवाने शुरू कर दिए.
ये बंकर व्लोर की खाड़ी से लेकर राजधानी तिराना की पहाड़ियों तक पर बनाए गए हैं.
मोंटेनीग्रो की सीमा से लेकर यूनान के द्वीप कोर्फू तक ये बंकर बने हुए हैं.
मोटे अंदाज़े के मुताबिक़, पूरे देश में क़रीब पौने दो लाख बंकर एनवर होक्सहा के राज में बनवाए गए थे.
बंकरों के निर्माण का आर्थिक भार
आज भी ये बंकर पूरे देश में बिखरे हुए हैं. पहाड़ियों से लेकर खेतों तक, हाइवे से लेकर समुद्र तट तक बंकरों का बोलबाला है.
कहा जाता है कि एक बंकर बनाने में दो बेडरूम का मकान बनाने के बराबर ख़र्च आया होगा.
इन्हें बनाने की वजह से ही अल्बानिया यूरोप का सबसे ग़रीब देश बन गया.
इन बंकरों की ऐसी आर्थिक विरासत बनी जिसका बोझ अल्बानिया के लोग आज भी उठा रहे हैं.
असल में एनवर होक्सहा ने अपने देश के लोगों को एक मंत्र दिया था-हमेशा तैयार रहो. उसका ये मिज़ाज दूसरे विश्व युद्ध में मिले तजुर्बे से बना था.
हार से सीखे सबक
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अल्बानिया को इटली की सेना ने केवल 5 दिन में हरा दिया था.
हालांकि, इटली के कब्ज़े का विरोध अल्बानिया के लोगों ने छापामार लड़ाई के ज़रिए जारी रखा था.
युगोस्लाविया और ब्रिटेन-अमरीका की मदद से अल्बानिया के लोगों ने इटली और जर्मनी की सेनाओं पर हमले जारी रखे. इस छापामार लड़ाई के अगुवा एनवर होक्सहा ही थे.
जैसे-जैसे मित्र देशों की सेनाएं धुरी राष्ट्रों यानी जर्मनी और इटली पर भारी पड़ने लगीं, अल्बानिया के बाग़ी भी ताक़तवर होते गए.
नवंबर 1944 में अल्बानिया फ़ासीवादी ताक़तों से आज़ाद होने में कामयाब हो गया. इस जीत का श्रेय जैसे-तैसे जुटाई गई 70 हज़ार लोगों की वामपंथी सेना को जाता है.
पर, दुनिया में एक देश ऐसा भी है, जहां क़दम-क़दम पर बंकर मिलते हैं. इस देश का नाम है अल्बानिया. इसी देश में मदर टेरेसा का जन्म हुआ था.
पर, कई दशकों के कम्युनिस्ट शासन के दौरान ये मुल्क बाक़ी दुनिया से पूरी तरह से अलग-थलग रहा.
इसके वामपंथी तानाशाह एनवर होक्सहा को दुश्मनों का ऐसा ख़ौफ़ हुआ कि उसने पूरे देश में बंकर बनवा डाले.
अल्बानिया के गाइड एल्टन कॉशी मज़ाक़ में कहते हैं कि आज ये बंकर टूरिज़्म के विस्तार का ज़रिया बन गए हैं.
यूं तो अल्बानिया का हज़ारों साल पुराना इतिहास है. पर आज चालीस साल पुराना इतिहास, हज़ारों साल की विरासत पर भारी पड़ रही है.
युद्ध का डर
आप अल्बानिया के एड्रियाटिक तट से देश के भीतरी हिस्से की तरफ़ बढ़ें, तो क़दम-क़दम पर बंकर बने हुए दिखेंगे. दीवारों के ऊपर गोलाकार ताज सा रखा हुआ है.
ये बंकर 1970 के दशक में बनाए गए थे. उस वक़्त अल्बानिया दुनिया से पूरी तरह से कटा हुआ देश था.
इन्हें बनाने की सनक तानाशाह एनवर होक्सहा को उस वक़्त चढ़ी, जब अल्बानिया के रिश्ते सोवियत संघ से ख़राब हो गए.
एनवर को लगता था कि पड़ोसी देशों युगोस्लाविया और यूनान से लेकर अमरीका और सोवियत संघ तक, हर मुल्क उनके वतन पर चढ़ाई करने वाला है.
इसी डर से एनवर होक्सहा ने पूरे देश की हिफ़ाज़त के लिए बंकर बनवाने शुरू कर दिए.
ये बंकर व्लोर की खाड़ी से लेकर राजधानी तिराना की पहाड़ियों तक पर बनाए गए हैं.
मोंटेनीग्रो की सीमा से लेकर यूनान के द्वीप कोर्फू तक ये बंकर बने हुए हैं.
मोटे अंदाज़े के मुताबिक़, पूरे देश में क़रीब पौने दो लाख बंकर एनवर होक्सहा के राज में बनवाए गए थे.
बंकरों के निर्माण का आर्थिक भार
आज भी ये बंकर पूरे देश में बिखरे हुए हैं. पहाड़ियों से लेकर खेतों तक, हाइवे से लेकर समुद्र तट तक बंकरों का बोलबाला है.
कहा जाता है कि एक बंकर बनाने में दो बेडरूम का मकान बनाने के बराबर ख़र्च आया होगा.
इन्हें बनाने की वजह से ही अल्बानिया यूरोप का सबसे ग़रीब देश बन गया.
इन बंकरों की ऐसी आर्थिक विरासत बनी जिसका बोझ अल्बानिया के लोग आज भी उठा रहे हैं.
असल में एनवर होक्सहा ने अपने देश के लोगों को एक मंत्र दिया था-हमेशा तैयार रहो. उसका ये मिज़ाज दूसरे विश्व युद्ध में मिले तजुर्बे से बना था.
हार से सीखे सबक
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अल्बानिया को इटली की सेना ने केवल 5 दिन में हरा दिया था.
हालांकि, इटली के कब्ज़े का विरोध अल्बानिया के लोगों ने छापामार लड़ाई के ज़रिए जारी रखा था.
युगोस्लाविया और ब्रिटेन-अमरीका की मदद से अल्बानिया के लोगों ने इटली और जर्मनी की सेनाओं पर हमले जारी रखे. इस छापामार लड़ाई के अगुवा एनवर होक्सहा ही थे.
जैसे-जैसे मित्र देशों की सेनाएं धुरी राष्ट्रों यानी जर्मनी और इटली पर भारी पड़ने लगीं, अल्बानिया के बाग़ी भी ताक़तवर होते गए.
नवंबर 1944 में अल्बानिया फ़ासीवादी ताक़तों से आज़ाद होने में कामयाब हो गया. इस जीत का श्रेय जैसे-तैसे जुटाई गई 70 हज़ार लोगों की वामपंथी सेना को जाता है.
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